गीता 2:28: Difference between revisions
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'''प्रसंग-''' | '''प्रसंग-''' | ||
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आत्म तत्त्व अत्यन्त दुर्बोध होने के कारण उसे समझाने के लिये भगवान् ने उपर्युक्त श्लोकों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से उसके स्वरूप का वर्णन किया। अब अगले श्लोक में उस आत्म तत्त्व दर्शन, वर्णन और श्रवण की अलौकिकता और दुर्लभता का निरूपण करते हैं- | आत्म तत्त्व अत्यन्त दुर्बोध होने के कारण उसे समझाने के लिये भगवान् ने उपर्युक्त [[श्लोक|श्लोकों]] द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से उसके स्वरूप का वर्णन किया। अब अगले श्लोक में उस आत्म तत्त्व दर्शन, वर्णन और श्रवण की अलौकिकता और दुर्लभता का निरूपण करते हैं- | ||
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हे < | हे [[अर्जुन]]<ref>[[महाभारत]] के मुख्य पात्र है। वे [[पाण्डु]] एवं [[कुन्ती]] के तीसरे पुत्र थे। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के रूप में वे प्रसिद्ध थे। [[द्रोणाचार्य]] के सबसे प्रिय शिष्य भी वही थे। [[द्रौपदी]] को [[स्वयंवर]] में भी उन्होंने ही जीता था।</ref> ! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना हैं? ।।28।। | ||
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ== | |||
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==संबंधित लेख== | |||
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Latest revision as of 07:06, 4 January 2013
गीता अध्याय-2 श्लोक-28 / Gita Chapter-2 Verse-28
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टीका टिप्पणी और संदर्भसंबंधित लेख |
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