गीता 2:33: Difference between revisions

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==संबंधित लेख==
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Latest revision as of 07:40, 4 January 2013

गीता अध्याय-2 श्लोक-33 / Gita Chapter-2 Verse-33


अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।।33।।




किंतु यदि तू इस धर्म युक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा ।।33।।


Now, if you refuse to fight this righteous war; then, shirking your duty and losing your reputation, you will incur sin.(33)


अथ = और ; चेत् = यदि ; त्वम् = तूं ; इमम् = इस ; धर्म्यम् = धर्मयुक्त ; संग्रामम् = संग्रामको ; न = नहीं ; करिष्यसि = करेगा ; तत: = तो ; स्वधर्मम् = स्वधर्मको ; च = और ; कीर्तिम् = कीर्तिको ; हित्वा = खोकर ; पापम् = पापको ; अवप्स्यसि = प्राप्त होगा ;



अध्याय दो श्लोक संख्या
Verses- Chapter-2

1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 | 31 | 32 | 33 | 34 | 35 | 36 | 37 | 38 | 39 | 40 | 41 | 42 , 43, 44 | 45 | 46 | 47 | 48 | 49 | 50 | 51 | 52 | 53 | 54 | 55 | 56 | 57 | 58 | 59 | 60 | 61 | 62 | 63 | 64 | 65 | 66 | 67 | 68 | 69 | 70 | 71 | 72

अध्याय / Chapter:
एक (1) | दो (2) | तीन (3) | चार (4) | पाँच (5) | छ: (6) | सात (7) | आठ (8) | नौ (9) | दस (10) | ग्यारह (11) | बारह (12) | तेरह (13) | चौदह (14) | पन्द्रह (15) | सोलह (16) | सत्रह (17) | अठारह (18)

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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