गीता 9:30: Difference between revisions

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Revision as of 15:35, 21 March 2010

गीता अध्याय-9 श्लोक-30 / Gita Chapter-9 Verse-30

प्रसंग-


भगवान् भजन करने वालों में अनासक्तभाव प्रदर्शित करते हुए अब अगले दो श्लोकों में दुराचारी को भी शाश्वत शान्ति प्राप्त होने की घोषणा करके अपनी भक्ति की विशेष महिमा दिखलाते हैं-


अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव से मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: ।।30।।



यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है । अर्थात् उसने भली भाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर भजन के समान अन्य कुछ भी नही है ।।30।।

Even if the vilest sinner worship me with exclusive devotion, he should be accounted a saint; for he has rightly resolved. ( He is positive in his belief that there is nothing like devoted worship of god.) (30)


चेत् = यदि (कोई); सुदुराचार: = अतिशय दुराचारी; अनन्यभाक् = अनन्यभावसे मेरा भक्त हुआ; माम् = मेरे को(निरन्तर); भजते = भजता है; स: = वह; साधु: = साधु; मन्तव्य: = मानने योग्य है; हि = क्योंकि; सम्यक् व्यवसित्: = यथार्थ निश्चियवाला है ;



अध्याय नौ श्लोक संख्या
Verses- Chapter-9

1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 | 31 | 32 | 33 | 34

अध्याय / Chapter:
एक (1) | दो (2) | तीन (3) | चार (4) | पाँच (5) | छ: (6) | सात (7) | आठ (8) | नौ (9) | दस (10) | ग्यारह (11) | बारह (12) | तेरह (13) | चौदह (14) | पन्द्रह (15) | सोलह (16) | सत्रह (17) | अठारह (18)