गीता 3:40

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Revision as of 10:57, 21 March 2010 by Ashwani Bhatia (talk | contribs) (1 अवतरण)
Jump to navigation Jump to search

गीता अध्याय-3 श्लोक-40 / Gita Chapter-3 Verse-40

प्रसंग-


इस प्रकार कामरूप वैरी के अत्याचार का और वह जहाँ छिपा रहकर अत्याचार करता है, उन वासस्थानों का परिचय कराकर, अब भगवान् उस कामरूप वैरी को मारने की युक्ति बतलाते हुए उसे मार डालने के लिये <balloon link="अर्जुन" title="महाभारत के मुख्य पात्र है। पाण्डु एवं कुन्ती के वह तीसरे पुत्र थे । अर्जुन सबसे अच्छा धनुर्धर था। वो द्रोणाचार्य का शिष्य था। द्रौपदी को स्वयंवर मे जीतने वाला वो ही था। ¤¤¤ आगे पढ़ने के लिए लिंक पर ही क्लिक करें ¤¤¤">अर्जुन</balloon> को आज्ञा देते हैं-


इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ।।40।।



इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि– ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है ।।40।।

The senses, the mind and the intellect are declared to be its seat; screening the light of truth through these; it (desire) deludes the embodied soul. (40)


इन्द्रियाणि =इन्द्रियां; मन: =मन (और); अस्य = इसके; अधिष्ठानम् = वासस्था; उच्च्यते = कहे जाते हैं (और) एष: = यह (काम) एतै: = इन (मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ) द्वारा ही ज्ञानम् = ज्ञान को; आवृत्य = आच्छादित करके (इस); देहिनम् =जीवात्मा को; विमोहयति = मोहित करता है।



अध्याय तीन श्लोक संख्या
Verses- Chapter-3

1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14, 15 | 16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 | 23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 | 30 | 31 | 32 | 33 | 34 | 35 | 36 | 37 | 38 | 39 | 40 | 41 | 42 | 43

अध्याय / Chapter:
एक (1) | दो (2) | तीन (3) | चार (4) | पाँच (5) | छ: (6) | सात (7) | आठ (8) | नौ (9) | दस (10) | ग्यारह (11) | बारह (12) | तेरह (13) | चौदह (14) | पन्द्रह (15) | सोलह (16) | सत्रह (17) | अठारह (18)

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः