नवरात्र: Difference between revisions

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'''शारदीय नवरात्र'''<br />
[[चित्र:Durga-Devi.jpg|thumb|200|[[दुर्गा]] देवी<br />Durga Devi]]
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[[आश्विन]] शुक्ल [[प्रतिपदा]] से नवमी तक नवरात्र का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। नवरात्र में देवी माँ के व्रत रखे जाते हैं । स्थान–स्थान पर देवी माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती हैं । घरों में भी अनेक स्थानों पर कलश स्थापना कर [[दुर्गा]] सप्तशती पाठ आदि होते हैं । [[नरीसेमरी]] में देवी माँ की जोत के लिए श्रृद्धालु आते हैं और पूरे नवरात्र के दिनों में भारी मेला रहता है । शारदीय नवरात्र आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह व्रत किए जाते हैं। भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक बार 9-9 दिन ही ये विशिष्ट पूजाएं की जाती हैं।  इस काल को नवरात्र कहा जाता है। वर्ष में दो बार भगवती भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इनमें एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं और दूसरे श्राद्धपक्ष के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक।  आश्विन मास के इन नवरात्रों को 'शारदीय नवरात्र' कहा जाता है क्योंकि इस समय शरद ऋतु होती है। इस व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए।  उसी पर घट स्थापना करें।  फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कराएं। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग [[राम]] की मूर्ति स्थापित कर [[रामायण]] का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए।
'''नवरात्र''' [[हिन्दू धर्म]] में वर्णित [[पुराण|पुराणों]] के अनुसार माता भगवती की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है। [[भारत]] में नवरात्र का पर्व, एक ऐसा पर्व जो हमारी संस्कृति में महिलाओं के गरिमामय स्थान को दर्शाता है। वर्ष के चार नवरात्रों में [[चैत्र]], [[आषाढ़]], [[आश्विन]] और [[माघ]] की शुक्ल [[प्रतिपदा]] से नवमी तक नौ दिन के होते हैं, परंतु प्रसिद्धि में चैत्र और आश्विन के नवरात्र ही मुख्य माने जाते हैं। इनमें भी देवीभक्त आश्विन के नवरात्र धिक करते हैं। इनको यथाक्रम वासन्ती और शारदीय नवरात्र भी कहते हैं। इनका आरम्भ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से होता है। अतः यह प्रतिपदा ’सम्मुखी’ शुभ होती है। इनमें भी चैत्र नवरात्र की अपनी विशिष्टता और महत्ता है। इसकी विशिष्टता का कारण इस अवधि में सूक्ष्म वातावरण में दिव्य हलचलों का होना है।<ref>{{cite web |url=http://www.riiti.com/1540/chaitra_vaasanti_navaratra_2009_ghatsthapana_puja_muhurtha |title=चैत्र या वासन्ती नवरात्र  |accessmonthday=22 मार्च |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=रीति डॉट कॉम|language=हिन्दी }}</ref>
 
;शारदीय नवरात्र
शारदीय नवरात्र आश्विन [[शुक्ल पक्ष]] की प्रतिप्रदा से शुरू होता है। नवरात्र आश्विन मास में आने वाले नवरात्र का अधिक महत्त्व माना गया है। इसी नवरात्र में जगह-जगह गरबों की धूम रहती है।
;चैत्र या वासन्ती नवरात्र
चैत्र या वासन्ती नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा से होता है। चैत्र में आने वाले नवरात्र में अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा का विशेष प्रावधान माना गया है। वैसे दोनों ही नवरात्र मनाए जाते हैं। फिर भी इस नवरात्र को कुल देवी-देवताओं के पूजन की दृष्टि से विशेष मानते है। आज के भागमभाग के [[युग]] में अधिकाँश लोग अपने कुल देवी-देवताओं को भूलते जा रहे हैं। कुछ लोग समयाभाव के कारण भी पूजा-पाठ में कम ध्यान दे पाते हैं। जबकि इस और ध्यान देकर आने वाली अनजान मुसीबतों से बचा जा सकता है। ये कोई अन्धविश्वास नहीं बल्कि शाश्वत सत्य हैं।<ref>{{cite web |url=http://hindi.webdunia.com/%E0%A4%9A%E0%A5%88%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80/%E0%A4%9A%E0%A5%88%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%9C%E0%A4%A8-1090325111_1.htm |title=चैत्र नवरात्र में करें कुलदेवी का पूजन  |accessmonthday=22 मार्च |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=वेब दुनिया हिन्दी|language=हिन्दी }}</ref> 
{{seealso|नवदुर्गा रक्षामंत्र|विक्रमी संवत}}
==नियम और मान्यताएँ==
नवरात्र में देवी माँ के व्रत रखे जाते हैं। स्थान–स्थान पर देवी माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती हैं। घरों में भी अनेक स्थानों पर कलश स्थापना कर [[दुर्गा]] सप्तशती पाठ आदि होते हैं। [[नरीसेमरी]] में देवी माँ की जोत के लिए श्रृद्धालु आते हैं और पूरे नवरात्र के दिनों में भारी मेला रहता है। शारदीय नवरात्र आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह व्रत किए जाते हैं। भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक बार 9-9 दिन ही ये विशिष्ट पूजाएं की जाती हैं।  इस काल को नवरात्र कहा जाता है। वर्ष में दो बार भगवती भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इनमें एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं और दूसरे श्राद्धपक्ष के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक।  आश्विन मास के इन नवरात्रों को 'शारदीय नवरात्र' कहा जाता है क्योंकि इस समय शरद ऋतु होती है। इस व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए।  उसी पर घट स्थापना करें।  फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कराएं। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग [[राम]] की मूर्ति स्थापित कर [[रामायण]] का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए।
==पुराणों में नवरात्र==
मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर [[श्रीराम]] ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई, इसलिए इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है। [[मार्कण्डेय पुराण]] के अनुसार, दुर्गा सप्तशती में स्वयं भगवती ने इस समय शक्ति-पूजा को महापूजा बताया है। कलश स्थापना, देवी दुर्गा की स्तुति, सुमधुर घंटियों की आवाज, धूप-बत्तियों की सुगंध – यह नौ दिनों तक चलने वाले साधना पर्व नवरात्र का चित्रण है। हमारी संस्कृति में नवरात्र पर्व की साधना का विशेष महत्त्व है। नवरात्र पूजा पर्व वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र माह में, दूसरा आश्विन माह।
नवरात्र में ईश-साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। आश्विन माह की नवरात्र में [[रामलीला]], [[रामायण]], भागवत पाठ, अखंड कीर्तन जैसे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान प्रत्येक इंसान एक नए उत्साह और उमंग से भरा दिखाई पडता है। वैसे तो ईश्वर का आशीर्वाद हम पर सदा ही बना रहता है, किन्तु कुछ विशेष अवसरों पर उनके प्रेम, कृपा का लाभ हमें अधिक मिलता है। पावन पर्व नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा, सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है। इसके परिणामस्वरूप ही मनुष्यों को लोक मंगल के क्रिया-कलापों में आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।<ref name="JJ">{{cite web |url=http://devotionalsongs.jagranjunction.com/2011/09/28/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%BE/ |title=नवरात्र : माता भगवती की आराधना का श्रेष्ठ समय  |accessmonthday=22 मार्च |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=जागरण जंक्शन|language=हिन्दी }}</ref> 
==नवरात्र या नवरात्रि==
==नवरात्र या नवरात्रि==
[[संस्कृत]] व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुध्द है।
==नवरात्र क्या है==
{{दुर्गा}}
{{दुर्गा}}
[[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] द्वारा [[सूर्य देवता|सूर्य]] की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें [[मार्च]] व [[सितंबर]] माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को  
[[संस्कृत]] व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुद्ध है। [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] द्वारा [[सूर्य देवता|सूर्य]] की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें [[मार्च]] व [[सितंबर]] माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।
निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।
==नौ दिन या रात==
==नौ दिन या रात==
[[अमावस्या]] की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्त्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
[[अमावस्या]] की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्त्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।


शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुध्दि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुध्द बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
==नौ देवियाँ / नव देवी==
==नौ देवियाँ / नव देवी==
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#आंवला(सिद्धीदात्री)
#आंवला(सिद्धीदात्री)
क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।
क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।
==नवरात्र कथा==
पौराणिक कथानुसार प्राचीन काल में दुर्गम नामक राक्षस ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया। उनसे वरदान लेने के बाद उसने चारों [[वेद]] व [[पुराण|पुराणों]] को कब्जे में लेकर कहीं छिपा दिया। जिस कारण पूरे संसार में वैदिक कर्म बंद हो गया। इस वजह से चारों ओर घोर अकाल पड गया। पेड़-पौधे व नदी-नाले सूखने लगे। चारो ओर हाहाकार मच गया। जीव जंतु मरने लगे। सृष्टि का विनाश होने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए [[देवता|देवताओं]] ने व्रत रखकर नौ दिन तक मां जगदंबा की आराधना की और माता से सृष्टि को बचाने की विनती की।  तब मां भगवती व असुर दुर्गम के बीच घमासान युद्ध हुआ। मां भगवती ने दुर्गम का वध कर देवताओं को निर्भय कर दिया। तभी से नवदुर्गा तथा नव व्रत का शुभारंभ हुआ।<ref name="JJ"/>
====ध्यान मंत्र====
<blockquote><poem>वंदे वांच्छितलाभायाचंद्रार्धकृतशेखराम्
वृषारूढांशूलधरांशैलपुत्रीयशस्विनीम्॥
पूणेंदुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा
पट्टांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिता॥
प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्॥</poem><ref name="JJ"/> </blockquote>
====स्तोत्र मंत्र====
<blockquote><poem>प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम्
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम्
सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन
भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन
भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥</poem><ref name="JJ"/> </blockquote>
====कवच मंत्र====
<blockquote><poem>ओमकार:में शिर: पातुमूलाधार निवासिनी
हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरी॥
श्रीकार:पातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी
हूंकार:पातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृत॥
फट्कार:पातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा</poem><ref name="JJ"/> </blockquote>


==अष्टमी या नवमी==
==अष्टमी या नवमी==
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# अब कन्याओं को उचित उपहार तथा कुछ राशि भी भेंट में दें।  
# अब कन्याओं को उचित उपहार तथा कुछ राशि भी भेंट में दें।  
# जय माता दी कहकर उनके चरण छुएं और उनके प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाने से पहले पूरे घर में खेत्री के पास रखे कुंभ का जल सारे घर में बरसाएँ।  
# जय माता दी कहकर उनके चरण छुएं और उनके प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाने से पहले पूरे घर में खेत्री के पास रखे कुंभ का जल सारे घर में बरसाएँ।  
==नवरात्रों का महत्त्व==
नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक ओर मानसिक शक्तियों में वृ्द्धि करने के लिये अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते है। सभी नवरात्रों में माता के सभी [[शक्तिपीठ|51 पीठों]] पर भक्त विशेष रुप से माता एक दर्शनों के लिये एकत्रित होते है। जिनके लिये वहां जाना संभव नहीं होता है, उसे अपने निवास के निकट ही माता के मंदिर में दर्शन कर लेते है। नवरात्र शब्द, नव अहोरात्रों का बोध करता है। इस समय शक्ति के नव रुपों कि उपासना की जाती है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। उपासना और सिद्धियों के लिये दिन से अधिक रात्रियों को महत्त्व दिया जाता है। [[हिन्दू]] के अधिकतर पर्व रात्रियों में ही मनाये जाते है। रात्रि में मनाये जाने वाले पर्वों में [[दीपावली]], [[होलिका दहन]], [[दशहरा]] आदि आते है। [[शिवरात्रि]] और नवरात्रे भी इनमें से कुछ एक है। रात्रि समय में जिन पर्वों को मनाया जाता है, उन पर्वों में सिद्धि प्राप्ति के कार्य विशेष रुप से किये जाते हैं। नवरात्रों के साथ रात्रि जोड़ने का भी यही अर्थ है, कि माता शक्ति के इन नौ दिनों की रात्रियों को मनन व चिन्तन के लिये प्रयोग करना चाहिए।<ref name="नवरात्रे">{{cite web |url=http://astrobix.com/indian_festivals/navratri/navratri_importance.aspx|title=जाने नवरात्रों का महत्त्व ?  |accessmonthday=22 मार्च |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=नवरात्रे|language=हिन्दी }}</ref> 
====धार्मिक महत्त्व====
चैत्र और आश्चिन माह के नवरात्रों के अलावा भी वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्रे आते हैं। पहला गुप्त नवरात्रा आषाढ [[शुक्ल पक्ष]] व दूसरा गुप्त नवरात्रा माघ [[शुक्ल पक्ष]] में आता है। आषाढ और माघ मास में आने वाले इन नवरात्रों को गुप्त विधाओं की प्राप्ति के लिये प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन्हें साधना सिद्धि के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। तांन्त्रिकों व तंत्र-मंत्र में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिये यह समय ओर भी अधिक उपयुक्त रहता है। गृहस्थ व्यक्ति भी इन दिनों में माता की पूजा आराधना कर अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत करते है। इन दिनों में साधकों के साधन का फल व्यर्थ नहीं जाता है। मां अपने भक्तों को उनकी साधना के अनुसार फल देती है। इन दिनों में दान पुण्य का भी बहुत महत्त्व कहा गया है।<ref name="नवरात्रे"/>


{{seealso|नवदुर्गा रक्षामंत्र}}
{{seealso|नवदुर्गा रक्षामंत्र|विक्रमी संवत}}
 
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
<references/>
==बाहरी कड़ियाँ==
 
*[http://www.khaskhabar.com/hindi-news/National-chaitra-navratra-prolonged-by-one-day-this-year-2255030.html चैत्र नवरात्र: घर-घर होगा देवी का वास]
 
*[http://www.bhaskar.com/article/MP-BPL-navratri-from-23th-of-march-2994186.html चैत्र नवरात्र का हर दिन रहेगा खास, 23 से शुरू होगी नवरात्रि]
*[http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4324330.cms नवरात्र : 9 दिन, 9 देवी]
*[http://www.khaskhabar.com/hindi-news/National-chaitra-navratra-prolonged-by-one-day-this-year-2255030.html इस बार चैत्र नवरात्र दस दिन, रामनवमी होगी खास]
==संबंधित लेख==
==संबंधित लेख==
{{Navdurga2}}{{Navdurga}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}
{{Navdurga2}}{{Navdurga}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}
[[Category:संस्कृति कोश]]
[[Category:संस्कृति कोश]]
[[Category:पर्व और त्योहार]]
[[Category:पर्व और त्योहार]]

Revision as of 14:18, 22 March 2012

नवरात्र

[[चित्र:Durga-Devi.jpg|thumb|200|दुर्गा देवी
Durga Devi]] नवरात्र हिन्दू धर्म में वर्णित पुराणों के अनुसार माता भगवती की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है। भारत में नवरात्र का पर्व, एक ऐसा पर्व जो हमारी संस्कृति में महिलाओं के गरिमामय स्थान को दर्शाता है। वर्ष के चार नवरात्रों में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन के होते हैं, परंतु प्रसिद्धि में चैत्र और आश्विन के नवरात्र ही मुख्य माने जाते हैं। इनमें भी देवीभक्त आश्विन के नवरात्र धिक करते हैं। इनको यथाक्रम वासन्ती और शारदीय नवरात्र भी कहते हैं। इनका आरम्भ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से होता है। अतः यह प्रतिपदा ’सम्मुखी’ शुभ होती है। इनमें भी चैत्र नवरात्र की अपनी विशिष्टता और महत्ता है। इसकी विशिष्टता का कारण इस अवधि में सूक्ष्म वातावरण में दिव्य हलचलों का होना है।[1]

शारदीय नवरात्र

शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा से शुरू होता है। नवरात्र आश्विन मास में आने वाले नवरात्र का अधिक महत्त्व माना गया है। इसी नवरात्र में जगह-जगह गरबों की धूम रहती है।

चैत्र या वासन्ती नवरात्र

चैत्र या वासन्ती नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा से होता है। चैत्र में आने वाले नवरात्र में अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा का विशेष प्रावधान माना गया है। वैसे दोनों ही नवरात्र मनाए जाते हैं। फिर भी इस नवरात्र को कुल देवी-देवताओं के पूजन की दृष्टि से विशेष मानते है। आज के भागमभाग के युग में अधिकाँश लोग अपने कुल देवी-देवताओं को भूलते जा रहे हैं। कुछ लोग समयाभाव के कारण भी पूजा-पाठ में कम ध्यान दे पाते हैं। जबकि इस और ध्यान देकर आने वाली अनजान मुसीबतों से बचा जा सकता है। ये कोई अन्धविश्वास नहीं बल्कि शाश्वत सत्य हैं।[2]

  1. REDIRECTसाँचा:इन्हें भी देखें

नियम और मान्यताएँ

नवरात्र में देवी माँ के व्रत रखे जाते हैं। स्थान–स्थान पर देवी माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती हैं। घरों में भी अनेक स्थानों पर कलश स्थापना कर दुर्गा सप्तशती पाठ आदि होते हैं। नरीसेमरी में देवी माँ की जोत के लिए श्रृद्धालु आते हैं और पूरे नवरात्र के दिनों में भारी मेला रहता है। शारदीय नवरात्र आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह व्रत किए जाते हैं। भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक बार 9-9 दिन ही ये विशिष्ट पूजाएं की जाती हैं। इस काल को नवरात्र कहा जाता है। वर्ष में दो बार भगवती भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इनमें एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं और दूसरे श्राद्धपक्ष के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक। आश्विन मास के इन नवरात्रों को 'शारदीय नवरात्र' कहा जाता है क्योंकि इस समय शरद ऋतु होती है। इस व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए। उसी पर घट स्थापना करें। फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कराएं। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए।

पुराणों में नवरात्र

मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई, इसलिए इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, दुर्गा सप्तशती में स्वयं भगवती ने इस समय शक्ति-पूजा को महापूजा बताया है। कलश स्थापना, देवी दुर्गा की स्तुति, सुमधुर घंटियों की आवाज, धूप-बत्तियों की सुगंध – यह नौ दिनों तक चलने वाले साधना पर्व नवरात्र का चित्रण है। हमारी संस्कृति में नवरात्र पर्व की साधना का विशेष महत्त्व है। नवरात्र पूजा पर्व वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र माह में, दूसरा आश्विन माह। नवरात्र में ईश-साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। आश्विन माह की नवरात्र में रामलीला, रामायण, भागवत पाठ, अखंड कीर्तन जैसे सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान प्रत्येक इंसान एक नए उत्साह और उमंग से भरा दिखाई पडता है। वैसे तो ईश्वर का आशीर्वाद हम पर सदा ही बना रहता है, किन्तु कुछ विशेष अवसरों पर उनके प्रेम, कृपा का लाभ हमें अधिक मिलता है। पावन पर्व नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा, सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है। इसके परिणामस्वरूप ही मनुष्यों को लोक मंगल के क्रिया-कलापों में आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।[3]

नवरात्र या नवरात्रि

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संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुद्ध है। पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्चसितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।

नौ दिन या रात

अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्त्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

नौ देवियाँ / नव देवी

शैलपुत्री प्रथम|85px|link=कूष्माण्डा चतुर्थ ब्रह्मचारिणी द्वितीयं|80px|link=ब्रह्मचारिणी द्वितीयं चंद्रघंटा तृतीय|82px|link=चंद्रघंटा तृतीय कूष्माण्डा चतुर्थ|75px|link=कूष्माण्डा चतुर्थ स्कन्दमाता पंचम|85px|link=स्कन्दमाता पंचम कात्यायनी षष्टम|80px|link=कात्यायनी षष्टम कालरात्रि सप्तम|80px|link=कालरात्रि सप्तम महागौरी अष्टम|67px|link=महागौरी अष्टम

नौ दिन यानि हिन्दी माह चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष की पड़वा यानि पहली तिथि से नौवी तिथि तक प्रत्येक दिन की एक देवी मतलब नौ द्वार वाले दुर्ग के भीतर रहने वाली जीवनी शक्ति रूपी दुर्गा के नौ रूप हैं-

  1. शैलपुत्री
  2. ब्रह्मचारिणी
  3. चंद्रघंटा
  4. कूष्माण्डा
  5. स्कन्दमाता
  6. कात्यायनी
  7. कालरात्रि
  8. महागौरी
  9. सिद्धीदात्री

इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीज़ों से भी सम्बंध है, जिन्हें नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है- [[चित्र:Navaratri.jpg|thumb|250px|दुर्गा मेला, नवरात्र, वाराणसी]]

  1. कुट्टू (शैलान्न)
  2. दूध-दही
  3. चौलाई (चंद्रघंटा)
  4. पेठा (कूष्माण्डा)
  5. श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
  6. हरी तरकारी (कात्यायनी)
  7. काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
  8. साबूदाना (महागौरी)
  9. आंवला(सिद्धीदात्री)

क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।

नवरात्र कथा

पौराणिक कथानुसार प्राचीन काल में दुर्गम नामक राक्षस ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया। उनसे वरदान लेने के बाद उसने चारों वेदपुराणों को कब्जे में लेकर कहीं छिपा दिया। जिस कारण पूरे संसार में वैदिक कर्म बंद हो गया। इस वजह से चारों ओर घोर अकाल पड गया। पेड़-पौधे व नदी-नाले सूखने लगे। चारो ओर हाहाकार मच गया। जीव जंतु मरने लगे। सृष्टि का विनाश होने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए देवताओं ने व्रत रखकर नौ दिन तक मां जगदंबा की आराधना की और माता से सृष्टि को बचाने की विनती की। तब मां भगवती व असुर दुर्गम के बीच घमासान युद्ध हुआ। मां भगवती ने दुर्गम का वध कर देवताओं को निर्भय कर दिया। तभी से नवदुर्गा तथा नव व्रत का शुभारंभ हुआ।[3]

ध्यान मंत्र

वंदे वांच्छितलाभायाचंद्रार्धकृतशेखराम्
वृषारूढांशूलधरांशैलपुत्रीयशस्विनीम्॥
पूणेंदुनिभांगौरी मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा
पट्टांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिता॥
प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्॥

[3]

स्तोत्र मंत्र

प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम्
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम्
सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन
भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन
भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥

[3]

कवच मंत्र

ओमकार:में शिर: पातुमूलाधार निवासिनी
हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरी॥
श्रीकार:पातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी
हूंकार:पातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृत॥
फट्कार:पातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा

[3]

अष्टमी या नवमी

यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार, बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए। वैसे अष्टमी, नवमी और दशहरे के चार दिन बाद की चौदस, इन तीनों की महत्ता 'दुर्गासप्तशती' में कही गई है।

कन्या पूजन

अष्टमी और नवमी दोनों ही दिन कन्या पूजन और लोंगड़ा पूजन किया जा सकता है। अतः श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करना चाहिये।

  1. सर्वप्रथम माँ जगदम्बा के सभी नौ स्वरूपों का स्मरण करते हुए घर में प्रवेश करते ही कन्याओं के पाँव धोएं।
  2. इसके बाद उन्हें उचित आसन पर बैठाकर उनके हाथ में मौली बांधे और माथे पर बिंदी लगाएं।
  3. उनकी थाली में हलवा-पूरी और चने परोसे।
  4. अब अपनी पूजा की थाली जिसमें दो पूरी और हलवा-चने रखे हुए हैं, के चारों ओर हलवा और चना भी रखें। बीच में आटे से बने एक दीपक को शुद्ध घी से जलाएं।
  5. कन्या पूजन के बाद सभी कन्याओं को अपनी थाली में से यही प्रसाद खाने को दें।
  6. अब कन्याओं को उचित उपहार तथा कुछ राशि भी भेंट में दें।
  7. जय माता दी कहकर उनके चरण छुएं और उनके प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाने से पहले पूरे घर में खेत्री के पास रखे कुंभ का जल सारे घर में बरसाएँ।

नवरात्रों का महत्त्व

नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक ओर मानसिक शक्तियों में वृ्द्धि करने के लिये अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते है। सभी नवरात्रों में माता के सभी 51 पीठों पर भक्त विशेष रुप से माता एक दर्शनों के लिये एकत्रित होते है। जिनके लिये वहां जाना संभव नहीं होता है, उसे अपने निवास के निकट ही माता के मंदिर में दर्शन कर लेते है। नवरात्र शब्द, नव अहोरात्रों का बोध करता है। इस समय शक्ति के नव रुपों कि उपासना की जाती है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। उपासना और सिद्धियों के लिये दिन से अधिक रात्रियों को महत्त्व दिया जाता है। हिन्दू के अधिकतर पर्व रात्रियों में ही मनाये जाते है। रात्रि में मनाये जाने वाले पर्वों में दीपावली, होलिका दहन, दशहरा आदि आते है। शिवरात्रि और नवरात्रे भी इनमें से कुछ एक है। रात्रि समय में जिन पर्वों को मनाया जाता है, उन पर्वों में सिद्धि प्राप्ति के कार्य विशेष रुप से किये जाते हैं। नवरात्रों के साथ रात्रि जोड़ने का भी यही अर्थ है, कि माता शक्ति के इन नौ दिनों की रात्रियों को मनन व चिन्तन के लिये प्रयोग करना चाहिए।[4]

धार्मिक महत्त्व

चैत्र और आश्चिन माह के नवरात्रों के अलावा भी वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्रे आते हैं। पहला गुप्त नवरात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष व दूसरा गुप्त नवरात्रा माघ शुक्ल पक्ष में आता है। आषाढ और माघ मास में आने वाले इन नवरात्रों को गुप्त विधाओं की प्राप्ति के लिये प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन्हें साधना सिद्धि के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। तांन्त्रिकों व तंत्र-मंत्र में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिये यह समय ओर भी अधिक उपयुक्त रहता है। गृहस्थ व्यक्ति भी इन दिनों में माता की पूजा आराधना कर अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत करते है। इन दिनों में साधकों के साधन का फल व्यर्थ नहीं जाता है। मां अपने भक्तों को उनकी साधना के अनुसार फल देती है। इन दिनों में दान पुण्य का भी बहुत महत्त्व कहा गया है।[4]

  1. REDIRECTसाँचा:इन्हें भी देखें

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चैत्र या वासन्ती नवरात्र (हिन्दी) रीति डॉट कॉम। अभिगमन तिथि: 22 मार्च, 2012।
  2. चैत्र नवरात्र में करें कुलदेवी का पूजन (हिन्दी) वेब दुनिया हिन्दी। अभिगमन तिथि: 22 मार्च, 2012।
  3. 3.0 3.1 3.2 3.3 3.4 नवरात्र : माता भगवती की आराधना का श्रेष्ठ समय (हिन्दी) जागरण जंक्शन। अभिगमन तिथि: 22 मार्च, 2012।
  4. 4.0 4.1 जाने नवरात्रों का महत्त्व ? (हिन्दी) नवरात्रे। अभिगमन तिथि: 22 मार्च, 2012।

बाहरी कड़ियाँ

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