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स्वराज पार्टी

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स्वराज पार्टी ब्रिटिश भारत में स्वतंत्रता संग्राम के समय बना एक प्रमुख राजनीतिक दल था। इस दल ने भारतीयों के लिये अधिक से अधिक स्व-शासन तथा राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिये कार्य किया था। स्वराज पार्टी को उत्तर भारत के सम्पन्न वकीलों में से एक मोतीलाल नेहरू (1861-1931 ई.) ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर से शुरू किया था। 'स्वराज' शब्द का वास्तविक अर्थ है- 'अपना स्वयं का शासन'।

  • मोतीलाल नेहरू के साथ-साथ बंगाल के चितरंजन दास (1870-1925 ई.) ने भी इस पार्टी के नेतृत्व में भागीदारी की।
  • 1923 ई. में स्वराज पार्टी ने 'केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली' का चुनाव लड़ा।
  • पार्टी ने परिषद में रहकर सरकार विरोधी आन्दोलन के ज़रिये सरकारी नीति में बाधा डालने और ब्रिटिश शासन को पटरी से उतारने का लक्ष्य बनाया।
  • हालाँकि गाँधीजी का असहयोग आन्दोलन ही कांग्रेस की प्राथमिक रणनीति बना रहा।
  • कांग्रेस असहयोग आन्दोलन को वापस लेना नहीं चाहती थी, क्योंकि इस आन्दोलन को भारी सफलता प्राप्त हो रही थी।
  • विश्वयुद्ध के बाद के सुधारों में वास्तविक आंशिक सहयोग उन कांग्रेस नेताओं की वैकल्पिक नीति बन गया, जो कम रूढ़िवादी हिन्दू या अधिक धर्मनिरपेक्ष विचाराधारा के थे।
  • 1923 ई. में 'केन्द्रीय लेजिस्लेटिव एसेंबली' में स्वराजियों ने 40 से अधिक सीटें जीतीं।
  • इतनी सीटें जीतने पर भी उनकी संख्या कभी भी इतनी नहीं रही कि वे अंग्रेज़ों को ऐसा विधेयक पारित करने से रोक सकते, जिसे अंग्रेज़ आन्तरिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए ज़रूरी समझते थे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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