ऋग्भाष्य

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ऋग्भाष्य ऋग्वेद के ऊपर लिखे गए भाष्य साहित्य का सामूहिक नाम है।

  • ऋग्वेद के अर्थ को स्पष्ट करने के सम्बंध में दो ग्रंथ अत्यन्त प्राचीन समझे जाते हैं। एक 'निघण्टु' है और दूसरा यास्क का 'निरुक्त'।
  • देवराज यज्वा 'निघण्टु' के टीकाकार थे। दुर्गाचार्य ने 'निरुक्त' पर अपनी सुप्रसिद्ध वृत्ति लिखी थी।
  • निघण्टु की टीका वेदभाष्य करने वाले एक स्कंदस्वामी के नाम से भी पायी जाती है। सायणाचार्य वेद के परवर्ती भाष्यकार थे।
  • यास्क के समय से लेकर सायण के समय तक विशेष रूप से कोई भाष्यकार प्रसिद्ध नहीं हुआ था।
  • वेदांतमार्गी लोग संहिता की व्याख्या की ओर विशेष रुचि नहीं रखते, फिर भी वैष्णव सम्प्रदाय के एक आचार्य आनन्द तीर्थ (मध्वाचार्य स्वामी) ने 'ऋग्वेदसंहिता' के कुछ अंशों का श्लोकमय भाष्य किया था। फिर रामचंद्र तीर्थ ने उस भाष्य की टीका लिखी थी।[1]
  • सायण ने अपने विस्तृत ‘ऋग्भाष्य’ में भट्टभास्कर मिश्र और भरतस्वामी, वेद के दो भाष्यकारों का उल्लेख किया है।
  • कतिपय अंश चण्डू पण्डित, चतुर्वेद स्वामी, युवराज रावण और वरदराज के भाष्यों के भी पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त मुद्गल, कपर्दी, आत्मानंद और कौशिक आदि कुछ भाष्यकारों के नाम भी सुनने में आते हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दू धर्मकोश |लेखक: डॉ. राजबली पाण्डेय |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 131 |

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