नादबिन्दुपनिषद

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इस उपनिषद के प्रारम्भ में 'ॐकार' को हंस के रूप में अभिव्यक्त किया है और उसके विविध अंगों का विश्लेषण किया गया है। उसके बाद 'ॐ ' की बारह मात्राओं का उल्लेख करते हुए उनके साथ प्राण के विनियोग (सम्बन्ध) का फल स्थापित किया है। तदुपरान्त अनेक प्रकारों और साधना के द्वारा 'नाद' अनुभूति के स्वरूप को समझाया गया है। अन्त में मन के लय होने की स्थिति का वर्णन हैं।

ॐकार प्रणव-रूप 'हंस' है

हंस का दक्षिण पंख 'अकार' है और उत्तर पंख (बायां पंख) 'उकार' है तथा उसकी पूंछ 'मकार' है और अर्धमात्रा उसका शीर्षभाग है। ओंकाररूपी हंस के दोनों पैर 'रजोगुण' एवं 'तमोगुण' हैं और उसका शरीर 'सतोगुण' कहा गया है। उसकी दाईं आंख 'धर्म है और बाई आंख 'अधर्म' है। हंस के दोनों पैरों में भू-लोक (पृथिवी) स्थित है। उसकी जंघाओं में भुव:लोक (अन्तरिक्ष) केन्द्रित है। स्व:लोक (स्वर्ग-ऊर्ध्व) उसका कटि प्रदेश है और मह:लोक (आनन्दलोक) उसकी नाभि में स्थित है। उसके हृदयस्थल में जनलोक और कण्ठ में तपोलोक का वास है। ललाट और भौहों के मध्य में 'सत्यलोक' स्थित है। इस प्रकार विद्वान् साधक प्रणव-रूपी हंस पर आसीन होकर, अर्थात् ओंकार का ज्ञान प्राप्त कर कर्मानुष्ठान तथा ध्यान आदि के द्वारा 'ॐ' का चिन्तन-मनन करता हुआ, सहस्त्रों-करोंड़ों पापों से मुक्त होकर 'मोक्ष' को प्राप्त कर लेता है।

ॐकार की बारह मात्राएं

ओंकार की प्रथम मात्रा आग्नेयी है, दूसरी मात्रा वायव्या (वायु की भांति) है, तीसरी मात्रा मकार सूर्य मण्डल के समान है, चौथी मात्रा अर्धमात्रा है, जिसे वारुणी भी कहा जाता है। इन चारों मात्राओं में से प्रत्येक मात्रा के तीन-तीन काल, अर्थात् कला-रूप हैं। इसीलिए ॐकार को बारह कलाओं से युक्त कहा गया है। ॐकार की साधना मात्र मन्त्रों के उच्चारण करने से पूरी नहीं होती। इसे 'दिव्य प्राण-रूप' समझकर अपनी अनुभूति से जानने का प्रयास करना चाहिए।

बारह कलाओं की मात्राएं

इन बारह कलाओं की मात्राओं में प्रथम मात्रा को घोषिणी कहा गया है। दूसरी मात्रा को विद्युन्मात्रा, तीसरी को पातंगी, चौथी को वायुवेगिनी, पांचवीं को नामधेया, छठी से ऐन्द्री, सातवीं को वैष्णवी, आठवीं को शांकरी, नौवीं को महती, दसवीं को धृति, ग्यारहवीं को नारी और बारहवीं को ब्राह्मी के नाम से जाना जाता है। यदि साधक ॐकार की प्रथम मात्रा में अपने प्राणों का परित्याग कर देता है, तो वह भारतवर्ष का सार्वभौमिक चक्रवर्ती सम्राट हो सकता हैं। [1] यदि साधक दूसरी मात्रा में प्राणों का उत्सर्ग करता है, तो वह महान् महिमामण्डित 'यक्ष' के रूप में उत्पन्न होता है। तीसरी मात्रा में प्राण त्यागने पर 'विद्याधर' के रूप में जन्म लेता है, चौथी मात्रा में प्राण त्यागने पर वह 'गन्धर्व' के रूप में, पांचवीं मात्रा में 'तुषित' तथा छठी मात्रा में देवराज इन्द्र के 'सायुज्य पद' को प्राप्त करता है। इसी प्रकार सातवीं मात्रा में भगवान विष्णु के 'वैकुण्ठधाम' को, आठवीं मात्रा में पशुपति भगवान शिव के 'रुद्रलोक' को, नवीं मात्रा में 'आनन्दलोक' को, दसवीं मात्रा में 'जनलोक' को, ग्यारहवीं मात्रा में 'तपोलोक' को और बारहवीं मात्रा में प्राण त्यागने पर शाश्वत 'ब्रह्मलोक' को प्राप्त करता है। इस परम 'ब्रह्मलोक' से ही अग्नि, सूर्य और चन्द्र आदि ज्योतियों का प्रादुर्भाव हुआ है। जब कोई श्रेष्ठ साधक अपने मन को नियन्त्रित करके समस्त इन्द्रियों एवं 'सत', 'रज' और 'तम' आदि तीनों गुणों से परे होकर 'परमतत्त्व' में विलीन हो जाता है, तब वह उपमारहित, कल्याणकारी और शान्त-स्वरूप हो जाता है। 'योगी' साधक इन्हें ही कहा जाता है। [2] ऐसा साधक अथवा योगी निर्मल कैवल्य पद को प्राप्त कर स्वयं ही परमात्म स्वरूप हो जाता है और ब्रह्म-भाव से असीम अनन्द की अनुभूति करता है। अत: कहा भी है- [3] हे ज्ञानवान पुरुष! तुम सतत प्रयत्न करते हुए 'आत्मा' के स्वरूप को पहचानने का प्रयास करो। उसी चिन्तन में अपने समय को लगाओं। प्रारब्ध और कर्मानुसार जो भी कष्ट अथवा कठिनाइयां सामने आयें, उन्हें भोगते हुए खिन्न अथवा दुखी नहीं होना चाहिए।

परब्रह्म का 'नाद' स्वरूप

'नाद' ध्वनि को कहते हैं। ॐकार-स्वरूप ब्रह्म का आत्मा के साथ तादात्म्य स्थापित होते ही, शिव के कल्याणकारी स्वयं प्रकाश 'नाद-रूप' की अनुभूति होने लगती है। अभ्यास द्वारा 'नाद' को अनुभूतिजन्य बनाने के लिए योगी अथवा साधक 'अकार' और 'मकार' को जीतकर सम्पूर्ण 'ॐकार' को शनै:-शनै: आत्मसात कर लेता है और 'तुर्यावस्था' को प्राप्त कर लेता है। अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में यह 'महानाद' (अनाहत ध्वनि) विभिन्न स्वरों में सुनाई पड़ती है। शनै:-शनै: अभ्यास से इसके सूक्ष्म भेद स्पष्ट होने लगते हैं। प्रारम्भ में यह ध्वनि समुद्र, मेघ, भेरी तथा झरनों से उत्पन्न ध्वनियों के समान सुनाई पड़ती है। कुछ समय बाद यह ध्वनि मृदंग, घण्टे और नगाड़े की भांति सुनाई पड़ती है। अन्त में यह किंकिणी, वंशी, वीणा एवं भ्रमर की मधुर ध्वनि के समान सुनाई पड़ती है। संयमी पुरुष को चाहिए कि नाद-श्रवण से भिन्न विषय-वासनाओं को उपेक्षित करके सतत अभ्यास द्वारा मन को उसी 'नाद' में लगाये और उसी में रमण करता रहे—[4] अर्थात् योगी साधक को सतत चिन्तन करते हुए समस्त चिन्ताओं का परित्याग कर, सभी तरह को चेष्टाओं से मन को तटस्थ कर, उस 'नाद' का ही अनुसन्धान करते रहना चाहिए, क्योंकि इससे चित्त सहज ही 'नाद' में लय हो जाता है। जिस प्रकार फूलों का रस ग्रहण करता हुआ भ्रमर, पुष्प-गन्ध की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार सतत 'नाद-लय' में डूबा हुआ साधक विषय-वासनाओं की आकांक्षा नहीं करता। वह नि:शब्द हो जाता है और उसका मन परमब्रह्म के परमात्मततत्त्व का अनुभव करने लगता है। जब तक नाद है, तभी तक मन का अस्तित्त्व है। नाद के समापन होने पर मन भी 'अमन,'अर्थात् 'शून्यवत' हो जाता है- [5] इस प्रकार सतत नाद का अभ्यासरत योगी जाग्रत, स्वप्न तथा सुषप्ति आदि अवस्थाओं से मुक्त होकर सभी प्रकार की चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है और मान-अपमान से परे होकर समाधि द्वारा समस्त जड़-संगम का परित्याग कर 'ब्रह्ममय' हो जाता है-[6] 'नादबिन्दूपनिषद' का यही रहस्यात्मक ज्ञान है, जिसे साधक को सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'प्रथमायां तु मात्रायां यदि प्राणैर्वियुज्यते। भरतवर्षराजासौ सार्वभौम: प्रजायते।12।।'
  2. 'अतीन्द्रियं गुणातीतं मनोलीनं यदा भवेत्। अनुपमं शिवं शान्तं योगयुक्तं सदाविशेत्॥18॥'
  3. 'आत्मानं सततं ज्ञात्वा कालं नय महामते। प्रारब्धमखिलं भुंजन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि॥21॥'
  4. 'सर्वचिन्तां समुत्सृज्य सर्वचेष्टाविवर्जित:। नादमेवानुसंदध्यान्नादे चित्तं विलीयते॥41॥'
  5. 'नि:शब्द तत्पंर ब्रह्म परमात्मा समीयते। नादो यावन्मनस्तावन्नादान्तेऽपि मनोन्मनी॥48॥'
  6. 'न मानं तावमानं च संत्यक्त्वा तु समाधिना। अवस्थात्रयमन्वेति न चित्तं योगिन: सदा॥54॥'


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