रुद्र संहिता में भगवान शिव का जीवन-चरित्र वर्णित है। इसमें 'नारद मोह की कथा', 'सती का दक्ष के यज्ञ में देह त्याग', 'पार्वती का विवाह', 'मदन दहन', 'कार्तिकेय और गणेश पुत्रों का जन्म', 'पृथ्वी के परिक्रमा की कथा', 'शंखचूड़ राक्षस से युद्ध' और उसके संहार आदि की कथा का विस्तार से उल्लेख है।
शिव पूजा
शिव पूजा के प्रसंग में कहा गया है कि दूध, दही, मधु, घृत और गन्ने के रस (पंचामृत) से स्नान कराके चम्पक, पाटल, कनेर, मल्लिका तथा कमल के पुष्प चढ़ाएँ। फिर धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल अर्पित करें। इससे शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं। इसी संहिता में 'सृष्टि खण्ड' के अन्तर्गत जगत् का आदि कारण शिव को माना गया हैं शिव से ही आद्या शक्ति 'माया' का आविर्भाव होता हैं फिर शिव से ही 'ब्रह्मा' और 'विष्णु' की उत्पत्ति बताई गई है।[[चित्र:Hanuman.jpg|thumb|180px|हनुमान]]
हनुमान का परब्रह्म स्वरूप
'शिव पुराण' की 'रुद्र संहिता' में हनुमान के परब्रह्म स्वरूप की संपूर्णता की आधारशिला स्थापित की गई है। श्रीरुद्र से श्रीहनुमान जी की अभिन्नता और एकाकारता का उल्लेख है। याज्ञवल्क्य ने भारद्वाज को बोध प्रदान करते हुए कहा है कि- "परमात्मा नारायण ही श्री हनुमान हैं।" हनुमान को रुद्रों में ग्यारहवाँ रुद्र माना गया है। वह परम कल्याण, स्वरूप साक्षात शिव हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'हनुमान बाहुक' में भी इसका समर्थन किया है। 'वायु पुराण' के पूर्वाद्ध में भगवान महादेव के हनुमान रूप में अवतार लेने का उल्लेख है। 'विनय पत्रिका' के अनेक पदों में गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान को शंकर रूप मानकर 'देवमणि' रुद्रावतार महादेव, वामदेव, कालाग्रि आदि नामों से संबोधित किया है। हनुमान को पुराणों में कहीं भगवान शिव के अंश रूप में तो कहीं साक्षात शंकर जी के रूप में वर्णित किया गया है। 'शिव पुराण' की 'शतरुद्र संहिता' के बीसवें अध्याय से इस कथन की पुष्टि होती है। 'स्कंद पुराण' के अनुसार हनुमान से बढ़कर जगत में कोई नहीं है। किसी भी दृष्टि से चाहे पराक्रम, उत्साह, मति और प्रताप वर विचार करें अथवा शील माधुर्य और नीति को देखें, चाहे गाम्भीर्य चातुर्य और धैर्य को देखें, इस विशाल ब्रह्मांड में हनुमान जैसा कोई नहीं है। हनुमान जी के लिए 'वायुपुत्र' का जो प्रयोग होता है, उसकी दार्शनिक प्रतीकात्मक भूमिका जानना अनिवार्य है। वायु, गति, पराक्रम, विद्या, भक्ति और प्राण शब्द का पर्याय है। वायु के बिना या वायु की वृद्धि से प्राणियों का मरण होता है। साधक और योगी के लिए तो प्राण, वायु का नियमन योग की आधार भूमिका है। पवन सभी का प्राणदाता जनक है। इसी प्राणतत्व की भूमिका पर हनुमान जी पवनपुत्र सहज ही निरुपित हो जाते हैं।[1]
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा
- REDIRECTसाँचा:मुख्य
'शिव पुराण' की 'कोटिरुद्र संहिता' के सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है, उसके अनुसार-
[[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|200px|महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग]]
अवंती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण हुआ करता था। वह ब्राह्मण पार्थिव शिवलिंग निर्मित कर उनका प्रतिदिन पूजन किया करता था। उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस ने ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर समस्त तीर्थ स्थलों पर धार्मिक कर्मों को बाधित करना आरंभ कर दिया।[2] वह अवंती नगरी में भी आया और सभी ब्राह्मणों को धर्म-कर्म छोड़ देने के लिए कहा, किन्तु किसी ने उसकी आज्ञा नहीं मानी। फलस्वरूप उसने अपनी दुष्ट सेना सहित पावन ब्रह्मतेजोमयी अवंतिका में उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया। जन-साधारण त्राहि-त्राहि करने लगे और उन्होंने अपने आराध्य भगवान शंकर की शरण में जाकर प्रार्थना, स्तुति शुरू कर दी। तब जहाँ वह सात्विक ब्राह्मण पार्थिव शिव की अर्चना किया करता था, उस स्थान पर एक विशाल गड्ढा हो गया और भगवान शिव अपने विराट स्वरूप में उसमें से प्रकट हुए। विकट रूप धारी भगवान शंकर ने भक्तजनों को आश्वस्त किया और गगनभेदी हुंकार भरी- "मैं दुष्टों का संहारक महाकाल हूँ..." और ऐसा कहकर उन्होंने दूषण व उसकी हिंसक सेना को भस्म कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने श्रद्धालुओं से वरदान माँगने को कहा। अवंतिकावासियों ने प्रार्थना की-
महाकाल, महादेव! दुष्ट दंड कर प्रभो
मुक्ति प्रयच्छ नः शम्भो संसाराम्बुधितः शिव॥
अत्रैव् लोक रक्षार्थं स्थातव्यं हि त्वया शिव
स्वदर्श कान् नरांछम्भो तारय त्वं सदा प्रभो॥
अर्थात- "हे महाकाल, महादेव, दुष्टों को दंडित करने वाले प्रभु! आप हमें संसार रूपी सागर से मुक्ति प्रदान कीजिए, जनकल्याण एवं जनरक्षा हेतु इसी स्थान पर निवास कीजिए एवं अपने[3] दर्शन करने वाले मनुष्यों को अक्षय पुण्य प्रदान कर उनका उद्धार कीजिए। इस प्रार्थना से अभिभूत होकर भगवान महाकाल स्थिर रूप से वहीं विराजित हो गए और समूची अवंतिका नगरी शिवमय हो गई।
टीका टिप्पणी और संदर्भ
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